देहरादून: ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर अब उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में साफ दिखने लगा है। वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण उत्तराखंड के ग्लेशियर न सिर्फ तेजी से सिकुड़ रहे हैं, बल्कि उनके पीछे खिसकने (Retreat) की वजह से करोड़ों टन जमा मलबा और ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ (Hanging Glaciers) निचले इलाकों के लिए एक बड़ा टाइम बम बनते जा रहे हैं।
हाल ही में बदरीनाथ धाम के पास कंचन गंगा क्षेत्र में हुए ग्लेशियर ढहने (Glacier Collapse) और एवलांच की घटना ने इस खतरे की गंभीरता को एक बार फिर रेखांकित कर दिया है।
हैंगिंग ग्लेशियर और जमा मलबा: दोहरी चुनौती
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तराखंड में इस समय दो सबसे बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं:
करोड़ों टन मलबे का ढेर: ग्लेशियरों के ऊपर की तरफ खिसकने के कारण ढलान वाले क्षेत्रों में भारी मात्रा में बोल्डर और मलबा पीछे छूट रहा है। एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, अकेले केदारनाथ के ऊपरी भाग में 150 मीटर से अधिक ऊंचे मलबे के ढेर मौजूद हैं। यदि भविष्य में कोई बड़ा एवलांच आता है या अतिवृष्टि (क्लाउडबर्स्ट) होती है, तो यह मलबा वर्ष 2013 जैसी भीषण तबाही को दोबारा दोहरा सकता है।
अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर: खड़ी ढलानों पर लटके ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ तापमान बढ़ने के कारण कमजोर हो रहे हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और डीआरडीओ (DRDO) के हालिया साझा अध्ययन में अलकनंदा बेसिन में ऐसे कई संवेदनशील ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो कभी भी अचानक टूटकर नीचे गिर सकते हैं।
बदल रहा है ग्लेशियरों का भूगोल
ग्लोबल वार्मिंग के कारण सदियों पुराने ग्लेशियरों का स्वरूप बदल रहा है और वे कई हिस्सों में टूट रहे हैं:
नंदा देवी और साउथ ऋषि ग्लेशियर, जो कभी आपस में जुड़े हुए थे, अब पूरी तरह अलग हो चुके हैं।
कुमाऊं का प्रसिद्ध मिलम ग्लेशियर बीच-बीच में खाली जगह बनने के कारण अब 8 से 9 छोटे ग्लेशियरों के टुकड़ों में बंट चुका है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो इस सदी के अंत तक हिमालय का तापमान 5 से 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जो पूरे इकोसिस्टम को तबाह कर देगा।
2000 मीटर पर थमी बर्फबारी, बदला मौसम का चक्र
तापमान में बढ़ोतरी का सीधा असर बर्फबारी के पैटर्न पर पड़ा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां पहले 2000 मीटर की ऊंचाई तक अच्छी बर्फबारी होती थी, अब वह सीमा खिसककर 2500 मीटर तक पहुंच गई है। इसके अलावा, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) का चक्र भी बदल गया है। अब सर्दियों के बजाय देर से (फरवरी से अप्रैल के बीच) बर्फबारी हो रही है, जो ग्लेशियरों के पुनर्भरण (Recharge) के लिए उतनी प्रभावी नहीं होती।
अदृश्य खतरा: ‘पर्माफ्रॉस्ट’ का पिघलना
ग्लेशियरों के नीचे मौजूद जमी हुई मिट्टी और चट्टानों की परत, जिसे ‘पर्माफ्रॉस्ट’ कहा जाता है, अब गर्मी के कारण अंदर ही अंदर पिघल रही है। जमीन के 60 मीटर नीचे तक बर्फ फैलने और सिकुड़ने से उच्च पहाड़ी क्षेत्रों का आधार अस्थिर हो रहा है। यही वजह है कि केदारनाथ और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अब कंक्रीट या सीमेंट की टाइलों के बजाय ग्रेनाइट टाइल्स जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की सलाह दी जा रही है ताकि जमीन की प्राकृतिक हलचल को झेला जा सके।
विशेषज्ञों की चेतावनी:
“ग्लेशियरों का टूटना और एवलांच आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों (जैसे अंधाधुंध निर्माण, सड़कों का चौड़ीकरण और जलविद्युत परियोजनाएं) ने इनकी आवृत्ति (Frequency) और विनाशकारी क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है। अब समय आ गया है कि इन संवेदनशील घाटियों में बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर बेहद सतर्कता बरती जाए और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली) को और मजबूत किया जाए।”
** ब्यूरो रिपोर्ट, देहरादून। **
